किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जायेगी।
मुझको आखिर दूर तक कितनी वफा ले जायेगी।
मुझको अपने रास्ते का इल्म है अच्छी तरह
क्यों कहीं मुझको कोई पागल हवा ले जायेगी।
तमतमा उठ्ठेगा जब सूरज, तो पानी, दोस्तों
प्यास के मारों तलक काली घटा ले जायेगी।
मैं तो अपनी कोशिशों से जाऊँगा जंगल के पार
अपको उस पार क्या कोई दुआ ले जायेगी।
ज़िंदगी जब-जब भी आयेगी मेरी दहलीज़ पर
माँग कर मुझसे वो थोड़ा हौसला ले जायेगी।
‘नुर’ इस अल्हड़ पवन को इस तरह से साध तू
दूर तक दुनिया में वो तेरा कहा ले जायेगी।
Sunday, December 7, 2008
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